oplus_32

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तलाशते अवसर

 

​कितने बोझिल थे,

वे प्रतीक्षा के क्षण,

तुम्हारे इंतज़ार में।

मेरे लिए—

तुम्हें ढूँढना,

एक बड़ी चुनौती रहा।

 

​और जब तक जाना मैंने,

तुम तक पहुँचने का रास्ता,

तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

 

​तुम्हारी एक आवाज़ की ख़ातिर,

मैंने दिन-रात एक कर दिए।

कब आओगे? अब आओगे?

तब आओगे… जब आओगे—

मुझे अपनी ही जगह खड़ा पाओगे।

 

​मर्यादा की सब लक्ष्मण-रेखायें,

मेरे लिए मिट चुकी थीं,

पर मैं अडिग खड़ा रहा।

 

​मेरी भावनाओं को,

नई उड़ान देने—

वह एक शाम आई,

मैं कुछ बहका हुआ सा था,

जब तुम आई।

 

​लगा कि खुला आकाश मिल गया है,

तो क्यों न जी भरकर उड़ूँ?

मेरे सोच स्वच्छंद थे,

जब तुम आई।

 

​बहकी नज़र,

बहके विचार,

और बहकते वे कदम,

सब उस शाम के थे।

 

​तुम आई,

मुस्कुराई,

और चुपचाप चली गई।

हाँ! तुम ही तो थी,

जो मेरी किस्मत के—

मज़बूत दरवाज़े को,

खोलने के लिए आई थी।

 

​मगर अफ़सोस!

कि मैंने अपने ही हाथों से,

तुम्हारे मुँह पर—

अपनी किस्मत के दरवाज़े,

खुद ही बंद कर दिए थे।

तुम ही तो थी…

हाँ! ‘अवसर’ तुम्हीं तो थी।

 

 

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