July 22, 2024

आज हम एक ऐसे इतिहासकार के बारे में बात करने जा रहे हैं, जिन्हें हमारी कलम ने अपना आदर्श माना है, वे ऐसे इतिहासकार थे, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता को अपने जीवन का लक्ष्य माना था। उन्होंने सदा ही क्रांतिकारी आंदोलन से संपर्क रखा और बंगला तथा हिन्दी में साहित्य की रचना करके जन-जागृति में योगदान दिया। अगर हम अपनी बात को और भी विस्तृत रूप में कहें तो, वे पूरी तरह से क्रांतिकारी लेखक, पूरी तरह से इतिहासकार तथा पत्रकार थे। वे भारतीय जनजागरण के ऐसे विचारक थे, जिनके चिंतन और लेखन में स्थानीयता और अखिल भारतीयता का अद्भुत संगम था। वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के पक्के अनुयायी थे और बंगाल में जनजागृति लाने के कारण ये ‘बंगाल के तिलक’ भी कहे जाते थे। हिन्दी के प्रचार के लिए इन्होंने अपना सर्वस्व का त्याग कर दिया था। आईए आज हम बंगाल के तिलक को विस्तार से जानते हैं…

परिचय…

सखाराम गणेश देउसकर उनका नाम था, १७ दिसम्बर, १८६९ को बिहार के देवघर के पास ‘करौं’ नामक गांव में उनका जन्म हुआ था, जो अब झारखंड राज्य में है। मराठी मूल के देउसकर के पूर्वज महाराष्ट्र के रत्नागिरि ज़िले में शिवाजी के आलबान नामक किले के निकट देउस गाँव के निवासी थे। १८वीं सदी में मराठा शक्ति के विस्तार के समय इनके पूर्वज महाराष्ट्र के देउस गांव से आकर ‘करौं’ में बस गए थे।

शिक्षा…

पाँच वर्ष की अवस्था में माँ का देहांत हो जाने के बाद बालक सखाराम का पालन-पोषण इनकी विधवा बुआ के पास हुआ जो मराठी साहित्य से भली भाँति परिचित थीं। इनके जतन, उपदेश और परिश्रम ने सखाराम में मराठी साहित्य के प्रति प्रेम उत्पन्न किया। बचपन में वेदों के अध्ययन के साथ ही सखाराम ने बंगाली भाषा भी सीखी। इतिहास इनका प्रिय विषय था। ये बाल गंगाधर तिलक को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। सखाराम गणेश देउसकर ने वर्ष १८९१ में देवघर के आर. मित्र हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की और वर्ष १८९३ से इसी स्कूल में शिक्षक नियुक्त हो गए। यहीं वे राजनारायण बसु के संपर्क में आए और अध्यापन के साथ-साथ एक ओर अपनी सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि का विकास करते रहे।

लेखन तथा सम्पादन कार्य…

दूसरी ओर वे अपनी सामाजिक-राजनीतिक अभिव्यक्ति के लिए बांग्ला की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में राजनीति, सामाजिक और साहित्यिक विषयों पर लेख भी लिखते रहे। वर्ष १८९४ में देवघर में हार्ड नाम का एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट था, उसके अन्याय और अत्याचार से जनता परेशान थी। देउसकर ने उसके विरुद्ध कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले ‘हितवादी’ नामक पत्र में कई लेख लिखे, जिसके परिणामस्वरूप हार्ड ने देउसकर को स्कूल की नौकरी से निकालने की धमकी दी। उसके बाद देउसकर जी ने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और कलकत्ता जाकर ‘हितवादी अखबार’ में प्रूफ रीडर के रूप में काम करने लगे। कुछ समय बाद अपनी असाधारण प्रतिभा और परिश्रम की क्षमता के आधार पर वे ‘हितवादी’ के संपादक बना दिए गए।

सखाराम गणेश देउसकर संस्कृत, मराठी और हिन्दी भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। बंगला भाषा के प्रसिद्ध पत्र ‘हितवादी’ का ये संपादन करते थे। इनकी प्रेरणा से इस पत्र का ‘हितवार्ता’ के नाम से हिन्दी संस्करण निकला, जिसका संपादन पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर ने किया। हिन्दी में भी बंगला, मराठी आदि की भाँति विभक्ति शब्द से मिला कर लिखी जाए, इसके लिए देउसकर ने एक आंदोलन चलाया था। इनका एक बड़ा योगदान था ‘देशेर कथा’ नामक ग्रंथ की रचना। इसके प्रथम संस्करण का पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर ने ‘देश की बात’ नाम से हिन्दी में अनुवाद किया था। इस पुस्तक में पराधीन देश की दशा पर प्रकाश डाला गया था। विदेशी सरकार ने इसे प्रकाशित होते ही जब्त कर लिया था, पर गुप्त रूप से देश भर में इसका बहुत प्रचार हुआ। सखाराम गणेश देउसकर का घर अरविन्द घोष और बारीन्द्र घोष जैसे क्रांतिकारियों का मिलने का स्थान था, जो दिन में पत्रकारिता करते और रात्रि में अपने दल के कार्यों में संलग्न रहते। ये लोकमान्य के पक्के अनुयायी थे और बंगाल में जनजागृति लाने के कारण ये ‘बंगाल के तिलक’ कहलाते थे। हिन्दी के प्रचार के लिए भी ये निरंतर प्रयत्नशील रहे।

रचनाएँ…

सखाराम गणेश देउसकर के ग्रंथों और निबंधों की सूची बहुत लंबी है। डॉ. प्रभुनारायण विद्यार्थी ने एक लेख में देउसकर की रचनाओं का ब्योरा प्रस्तुत किया है। इनके कुछ प्रमुख ग्रंथों की सूची…

१. महामति रानाडे (१९०१)
२. झासीर राजकुमार (१९०१)
३. बाजीराव (१९०२)
४. आनन्दी बाई (१९०३)
५. शिवाजीर महत्व (१९०३)
६. शिवाजीर शिक्षा (१९०४)
७. देशेर कथा (१९०४)
८. कृषकेर सर्वनाश (१९०४)
९. शिवाजी (१९०६)
१०. देशेर कथा (परिशिष्ट) (१९०७)
११. तिलकेर मोकद्दमा ओ संक्षिप्त जीवन चरित (१९०८)

इन पुस्तकों के साथ-साथ इतिहास, धर्म, संस्कृति और मराठी साहित्य से संबंधित उनके लेख अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

सार्वजनिक सेवा…

सखाराम गणेश देउसकर ने सार्वजनिक सेवा कोलकाता में जाकर की। इन्होंने कोलकाता में शिवाजी महोत्सव आरंभ करके युवकों के अन्दर राष्ट्रीयता की भावना भरी। ये बंग भंग आंदोलन से पहले ही स्वदेशी के प्रवर्तक थे। देश की स्वतंत्रता को अपने जीवन का लक्ष्य मानने वाले सखाराम ने क्रांतिकारी आंदोलन से भी संपर्क रखा और बंगला तथा हिन्दी में साहित्य की रचना करके जन-जागृति में योगदान दिया। सखाराम गणेश देउसकर की अध्यक्षता में कोलकाता में ‘बुद्धिवर्धिनी सभा’ का गठन हुआ। इस सभा के माध्यम से युवकों के ज्ञान में वृद्धि तो होती ही थी, साथ ही साथ इन्हें राजनीतिक ज्ञान भी प्राप्त होता था और लोगों को स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की प्ररेणा मिलती थी। १९०५ में बंग-भंग के विरोद्ध में जो आंदोलन चला, उसमें सखाराम गणेश देउसकर का बड़ा योगदान था।

निधन…

राष्ट्रभक्त सखाराम गणेश देउसकर का अल्प आयु में ही २३ नवंबर, १९१२ को निधन हो गया।

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